बिहार का दर्द

मैं बिहार हूँ
कई दर्द सहे है मैने,
अपनों के पलायन के दर्द ,
ज़िंदगी की जिदोजेह्द्द के लिए अपनें को लड़ते देखने का दर्द
और ऐसी हजारों अनवरत दर्द
जो शब्दों और अल्फाजों में मुझसे आज तक समेटे नहीं गये ।
मुझ ये भी याद है
कैसे मुझ तक पहुँचने की होड़ में कई गड्डे में गिर के दम तोड़े थे
मैने शांति के प्रतीक गोतम बुध
और सम्राट अशोक की इस धरती पर कईयों को भेद-भाव में
उलझते और लड़ते देखा है,
मैंने मेरी धरोहर नालंदा विश्वविद्यालय का सुद्रढ़ किया था
जहाँ एक विश्व प्रसिद्ध शिक्षा
किन्तु आज वहीँ नक़ल और बिकती शिक्षा की बोलबाला है।
हम सब एक है,
सभी के खून और दर्द भी एक है,
लेकिन जात-पात में बाँट कर हमें
ओछे राजनीति की फायदे के लिए खद्दरधारियों को हमारे बिखराव पर
गैर मजहबी मुद्दों की रोटी सेकते देखा है ।
मैने जयप्रकाश नारायण की इस धरती पर
समाजवाद का क़त्ल होते देखा है,
आज मैं कुंठित हूँ कि आखिर मैं कौन सा बिहार हूँ,
आखिर मेरा वजूद क्या है ?
आखिर कब तक और मेरे भाई दो जून रोटी के लिए पलायन करते रहेंगे ??
आखिर और कब तक उच्च शिक्षा के लिए
हमारे होनहार भविष्य का दुसरे शहर में भटकते रहेगे ?
मै कभी था
एक सम्पूर्ण बिहार पर
सत्ता के लोभीयों ने मेरे अंग को काट दिए,
मेरे ह्रदय में जख्म भर दिए,
मुझसे मेरा पहाड़ छीने, कोयले से लेकर अबरक तक छीने,
कई उद्योग और कल कारखाने भी छीने
अब वही लोग मुझ से पूछते है
किन्तु उतर में मुख से शब्द गुम हो जाते है।
आज बस सहमी है आँखें,
सिर्फ इक इंतज़ार में भविष्य की तकती है आँखें,
कोई तो आओं बदलो मुझे
मैं फिर वही बिहार बनना चाहता हूँ,
जहाँ मैं कहूँ और तुम कहो
ये मेरा बिहार है और मैं बिहार हूँ ।

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