******************एक अन्त,एक शुरुआत****************

कुछ महीनें पहले मैंने एक हत्या क्या था
अपनी भावनावों का (लेकिन सिद्धांत और स्वविमान का नहीं)
मै हत्या करना नहीं चाह रहा था
परन्तु विवश था हत्या करना जरुरी था
मै हत्या के पहले भी रोया था
अपनी भावना अपनी संवेदना को आज मार डाला,
अपनी लाश को अपने कंधे पर उठाए चल रहा था
शमशान की तरफ बढ़ रहा था शमशान में अकेला था मै
कुत्ते की रोने की आवाज सन्नाटे को चीरते हुए
मेरे कानों को डस रहा था
चारो तरफ अँधेरा लेकिन“डर”भी मेरे कठोर निर्णय से अवगत था
इसलिए वह भी मुझे प्रभावित करने का प्रयत्न नहीं क्या
फिर अपने हाथो से अपनी चिता जलाई
थोरी दूर बैठ कर उस जलती चिता को देख रहा था
आकाश में सुबह की पहली किरण फैल रही थी
आपकी अस्थि को जल में परवाह क्या
काली स्याह रात में एक जीवन का अन्त हुआ
सुबह की पहली किरण में एक जीवन की शुरुआत हई
एक अन्त,एक शुरुआत
(मेरा भाव इंसान के जीवन में कुछ ऐसी भावनाए आती है जहा उसे मारना परता है चाहे अच्छी हो या बुरी तभी हम जीवन में आगे बदते है और एक निर्णय एक लक्ष्य अपने जीवन का निर्धारित कर उस पर चलते है.)

3 thoughts on “******************एक अन्त,एक शुरुआत****************

  1. दुःख तो होगा जरुर आपको की आपने उन भावनाओं को मिटाया ,
    वही खुश होंगे कभी ये सोच के की-मिला के नई सुबह से आँखे, कम से कम उन लम्हों का ख्याल तो आया !!

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