“आत्मविश्वास”

self-confidence.
जीवन के कई उतार चढ़ाव के देखा
कभी अच्छे को तो कभी-कभी बुरे को देखा
किसी ने अपमान किया
तो यह शहर में उससे कही ज्यादा मुझे सम्मान और प्यार दिया
और मुझे शक्ति दी मै भी उन बच्चें के लिए कुछ करू
आप सब की सेवा करू….
एक उदेश्य एक लक्ष्य को ले कर
निकल पड़ा बस आप शक्ति दे
और साथ में मुझे आशीर्वाद भी…..

कुछ भी तो नही

जीवन है पर जिंदिगी नहीं

जिंदिगी है पर उमंग नहीं

उमंग है पर उल्लास नहीं

आसूं है पर ख़ुशी कही खो गई

ख़ुशी आई तो हँसी ना जाने कहा चली गई

वजूद है तो वह लम्हा कही खो गई

मिट्टी के चूल्हें पे गोइठा की आच में पका मक्के की रोटी का वह स्वाद

गाँव के ढलते सूरज का वह शाम

जीवन चली जा रही है हर छोटी-बड़ी जरुरत को पूरा करते

फिर भी लगता है कुछ नहीं है…

कुछ भी तो नही…

 

 

बिहार का दर्द

मैं बिहार हूँ
कई दर्द सहे है मैने,
अपनों के पलायन के दर्द ,
ज़िंदगी की जिदोजेह्द्द के लिए अपनें को लड़ते देखने का दर्द
और ऐसी हजारों अनवरत दर्द
जो शब्दों और अल्फाजों में मुझसे आज तक समेटे नहीं गये ।
मुझ ये भी याद है
कैसे मुझ तक पहुँचने की होड़ में कई गड्डे में गिर के दम तोड़े थे
मैने शांति के प्रतीक गोतम बुध
और सम्राट अशोक की इस धरती पर कईयों को भेद-भाव में
उलझते और लड़ते देखा है,
मैंने मेरी धरोहर नालंदा विश्वविद्यालय का सुद्रढ़ किया था
जहाँ एक विश्व प्रसिद्ध शिक्षा
किन्तु आज वहीँ नक़ल और बिकती शिक्षा की बोलबाला है।
हम सब एक है,
सभी के खून और दर्द भी एक है,
लेकिन जात-पात में बाँट कर हमें
ओछे राजनीति की फायदे के लिए खद्दरधारियों को हमारे बिखराव पर
गैर मजहबी मुद्दों की रोटी सेकते देखा है ।
मैने जयप्रकाश नारायण की इस धरती पर
समाजवाद का क़त्ल होते देखा है,
आज मैं कुंठित हूँ कि आखिर मैं कौन सा बिहार हूँ,
आखिर मेरा वजूद क्या है ?
आखिर कब तक और मेरे भाई दो जून रोटी के लिए पलायन करते रहेंगे ??
आखिर और कब तक उच्च शिक्षा के लिए
हमारे होनहार भविष्य का दुसरे शहर में भटकते रहेगे ?
मै कभी था
एक सम्पूर्ण बिहार पर
सत्ता के लोभीयों ने मेरे अंग को काट दिए,
मेरे ह्रदय में जख्म भर दिए,
मुझसे मेरा पहाड़ छीने, कोयले से लेकर अबरक तक छीने,
कई उद्योग और कल कारखाने भी छीने
अब वही लोग मुझ से पूछते है
किन्तु उतर में मुख से शब्द गुम हो जाते है।
आज बस सहमी है आँखें,
सिर्फ इक इंतज़ार में भविष्य की तकती है आँखें,
कोई तो आओं बदलो मुझे
मैं फिर वही बिहार बनना चाहता हूँ,
जहाँ मैं कहूँ और तुम कहो
ये मेरा बिहार है और मैं बिहार हूँ ।

एक ख्वाब

कल रात ना जाने क्यों एक डरावना ख्वाब आया 
किसी का चेहरा चाँद में नजर आया…
डरा सहमा किसी अनजान पगडंडी पे 
अकेला चला जा रहा था 
ना किसी का साथ,ना किसी का हाथ 
पीछे छुटी वह यादे 
मुझे चीख चीख के पुकारती….
पर मै एक कठोर बन 
डरा सहमा अनजान पगडंडी पे 
अकेला चला जा रहा था……..

कल मेरे सामने एक सत्य खड़ा

कल मेरे सामने एक सत्य खड़ा

मुझे देख मुस्कुरा रहा था,

मैंने कहा “आज अचानक तुम आ ही गए

बहुत नुका-छुपी खेले मुझसे

बहुत प्रमाण दिए अपने झूठ होने का”

सत्य ने मुस्कुरा कर कहा

तुम समझ के भी नहीं समझते

झूठ हमेसा प्रमाण देती है

सत्य को इसकी जरुरत नहीं पडती

आज जब मेरा सामना हो ही गया

तो तुम और मजबूत हो गए

किसी को समझने की पहचाने का एक माध्यम हु मै  

अब तुम्हे धोखा देनें में कोई कामयाब नहीं हो सकता

जीवन पथ पे तुम एक बरगद की पेड़ की तरह खड़ा

हर तूफान का सामना कर सकते हो

हां मुझे तो आना ही था

अभी और भी बड़ा सत्य तुम्हारे सामने आने वाला है

खुद को मजबूत कर बस इंतजार करो.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

This entry was posted on September 19, 2013. 1 Comment

~~~~~~अंतरमन~~~~~~~

हर किसी के दिल में एक पीड़ा होती है

कोई कहता तो कोई कुछ भी नहीं कहता

उसका अंतरमन कुछ कहने नहीं देता

एक पीड़ा अपने अन्दर छुपाये रहता.

और छुपाये भी क्यों नहीं

आज कल किसी को सुनने का वक़्त नहीं मिलता

बेटा को माँ पिता के पास बैठने का वक़्त नहीं

भाई को भाई से कुछ मतलब नहीं

बहन को विदा कर उससे अब कोई नाता रिश्ता नहीं

जब अपने ही अपनों का दर्द नहीं बाटता

सभी अपने अपने भविष्य बनाने में लगा

उसे यह नहीं पता की जब वर्तमान मेरा सही होगा तो भविष्य इससे भी अच्छा होगा

फिर भी सभी अपने अपने भविष्य बनाने के लिए

एक दुसरे को कुचल कर सभी को पीछे छोड़ कर बढ़ रहा उस मंजिल की तरफ

पर क्या उसे ये पता है वहा जीवन का एक “सच” उसका इंतजार कर रहा है….

वहा  सब सुख तो मिलेगा पर अपने नहीं मिलेगे.

ढूंढेगे बहुत जाओगे आपने उस खंडहर घर में

और ढूंढेगे कभी इस कमरे में कभी उस कमरे में

पर किसी को नहीं ढूंढ पाओगे…किसी को नहीं ढूंढ पाओगे….|

 

 

आत्मकथा

आज मै अपनी आत्मकथा लिखने बैठा

तो खुद से पूछा की क्या मै स्वयं की आत्मकथा लिख सकता हू.

थोडा घबराया फिर हिम्मत कर लिखने बैठ गया

आत्मकथा लिखना आसान नहीं है

आत्मकथा आत्मा की आवाज है

जिन्दगी का आईना है

अच्छे बुरे शब्दों का संगम

अपनी आलोचना करनी पड़ती

सत्य को शब्द देना पड़ता है

फिर भी मै लिखने लगा अपनी आत्मकथा

लिखते वक्त मै स्वार्थी बन जाता

सत्य को छुपता झूठ को बनाता

अपना मुँह मिया मिट्टू

परन्तु खुद को सम्भाल कर लिखना छोड़ देता

फिर सत्य को अपने अंदर से निकलता

मैंने महसूस क्या की लिखते वक्त

खुद को शुन्य में रखना पड़ता है

अपना स्वाभिमान,अंहकार,कर्म,भावनाएं रिश्ते नाते को दूर रखना पड़ता है

और मै इन सबों से दूर नहीं जा सकता

अपनी आत्मकथा मै नहीं लिख सका

और कोई अपनी आत्मकथा लिख भी नहीं,

पता लिख भी नहीं पता……..