आज नहीं ये काम चलो कल कर लेंगे

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आज नहीं ये काम चलो कल कर लेंगे

आज नहीं ये काम चलो कल कर लेंगे

उसके चहरे से आँखों को कल भर लेंगे

उस आहात पर कल मर लेंगे

कल उसे ऐसा कह देंगे

कल उसे ऐसा सुन लेंगे

यह काम कल निपटा लेंगे

जो गीत नहीं हम होठों पर आ पाया आज

वो गीत चलो कल गा लेंगे

कल ज़ख्म यह सब भर जायेंगे

यह दुबला अश्क़ो में

कल जब खुशिया घर आएंगे

हम जे भर कर मुस्का लेंगे

जो आज गवाया है हमने

कल उससे बेहतर पा लेंगे

जो कुछ होता है आज उसे हो जाने दो

कल सब अच्छा हो जायेगा

हर ज़ख्म हर एक दुःख दर्द

कलम सो जायेगा खो जायेगा

पर जन मेरी कल आएगा……

*गुलाम अली का एक ग़ज़ल*

आप से तुम तक करीब तो आए

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आप से तुम तक करीब तो आए
पर आज तुम और आप के बिच बहुत फासला हो गया…
आप एक परिचित की तरह रिश्ते निभा रहा है
और तुम (अपनत्व) अपने अस्तित्व की तलाश में सामने खड़ा सब कुछ देख रहा है…

“आत्मविश्वास”

self-confidence.
जीवन के कई उतार चढ़ाव के देखा
कभी अच्छे को तो कभी-कभी बुरे को देखा
किसी ने अपमान किया
तो यह शहर में उससे कही ज्यादा मुझे सम्मान और प्यार दिया
और मुझे शक्ति दी मै भी उन बच्चें के लिए कुछ करू
आप सब की सेवा करू….
एक उदेश्य एक लक्ष्य को ले कर
निकल पड़ा बस आप शक्ति दे
और साथ में मुझे आशीर्वाद भी…..

कुछ भी तो नही

जीवन है पर जिंदिगी नहीं

जिंदिगी है पर उमंग नहीं

उमंग है पर उल्लास नहीं

आसूं है पर ख़ुशी कही खो गई

ख़ुशी आई तो हँसी ना जाने कहा चली गई

वजूद है तो वह लम्हा कही खो गई

मिट्टी के चूल्हें पे गोइठा की आच में पका मक्के की रोटी का वह स्वाद

गाँव के ढलते सूरज का वह शाम

जीवन चली जा रही है हर छोटी-बड़ी जरुरत को पूरा करते

फिर भी लगता है कुछ नहीं है…

कुछ भी तो नही…