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एक ख्वाब

कल रात ना जाने क्यों एक डरावना ख्वाब आया 
किसी का चेहरा चाँद में नजर आया…
डरा सहमा किसी अनजान पगडंडी पे 
अकेला चला जा रहा था 
ना किसी का साथ,ना किसी का हाथ 
पीछे छुटी वह यादे 
मुझे चीख चीख के पुकारती….
पर मै एक कठोर बन 
डरा सहमा अनजान पगडंडी पे 
अकेला चला जा रहा था……..

 
 

कल मेरे सामने एक सत्य खड़ा

कल मेरे सामने एक सत्य खड़ा

मुझे देख मुस्कुरा रहा था,

मैंने कहा “आज अचानक तुम आ ही गए

बहुत नुका-छुपी खेले मुझसे

बहुत प्रमाण दिए अपने झूठ होने का”

सत्य ने मुस्कुरा कर कहा

तुम समझ के भी नहीं समझते

झूठ हमेसा प्रमाण देती है

सत्य को इसकी जरुरत नहीं पडती

आज जब मेरा सामना हो ही गया

तो तुम और मजबूत हो गए

किसी को समझने की पहचाने का एक माध्यम हु मै  

अब तुम्हे धोखा देनें में कोई कामयाब नहीं हो सकता

जीवन पथ पे तुम एक बरगद की पेड़ की तरह खड़ा

हर तूफान का सामना कर सकते हो

हां मुझे तो आना ही था

अभी और भी बड़ा सत्य तुम्हारे सामने आने वाला है

खुद को मजबूत कर बस इंतजार करो.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
1 Comment

Posted by on September 19, 2013 in Uncategorized

 

~~~~~~अंतरमन~~~~~~~

हर किसी के दिल में एक पीड़ा होती है

कोई कहता तो कोई कुछ भी नहीं कहता

उसका अंतरमन कुछ कहने नहीं देता

एक पीड़ा अपने अन्दर छुपाये रहता.

और छुपाये भी क्यों नहीं

आज कल किसी को सुनने का वक़्त नहीं मिलता

बेटा को माँ पिता के पास बैठने का वक़्त नहीं

भाई को भाई से कुछ मतलब नहीं

बहन को विदा कर उससे अब कोई नाता रिश्ता नहीं

जब अपने ही अपनों का दर्द नहीं बाटता

सभी अपने अपने भविष्य बनाने में लगा

उसे यह नहीं पता की जब वर्तमान मेरा सही होगा तो भविष्य इससे भी अच्छा होगा

फिर भी सभी अपने अपने भविष्य बनाने के लिए

एक दुसरे को कुचल कर सभी को पीछे छोड़ कर बढ़ रहा उस मंजिल की तरफ

पर क्या उसे ये पता है वहा जीवन का एक “सच” उसका इंतजार कर रहा है….

वहा  सब सुख तो मिलेगा पर अपने नहीं मिलेगे.

ढूंढेगे बहुत जाओगे आपने उस खंडहर घर में

और ढूंढेगे कभी इस कमरे में कभी उस कमरे में

पर किसी को नहीं ढूंढ पाओगे…किसी को नहीं ढूंढ पाओगे….|

 

 

 

आत्मकथा

आज मै अपनी आत्मकथा लिखने बैठा

तो खुद से पूछा की क्या मै स्वयं की आत्मकथा लिख सकता हू.

थोडा घबराया फिर हिम्मत कर लिखने बैठ गया

आत्मकथा लिखना आसान नहीं है

आत्मकथा आत्मा की आवाज है

जिन्दगी का आईना है

अच्छे बुरे शब्दों का संगम

अपनी आलोचना करनी पड़ती

सत्य को शब्द देना पड़ता है

फिर भी मै लिखने लगा अपनी आत्मकथा

लिखते वक्त मै स्वार्थी बन जाता

सत्य को छुपता झूठ को बनाता

अपना मुँह मिया मिट्टू

परन्तु खुद को सम्भाल कर लिखना छोड़ देता

फिर सत्य को अपने अंदर से निकलता

मैंने महसूस क्या की लिखते वक्त

खुद को शुन्य में रखना पड़ता है

अपना स्वाभिमान,अंहकार,कर्म,भावनाएं रिश्ते नाते को दूर रखना पड़ता है

और मै इन सबों से दूर नहीं जा सकता

अपनी आत्मकथा मै नहीं लिख सका

और कोई अपनी आत्मकथा लिख भी नहीं,

पता लिख भी नहीं पता……..

 

“मै”

आज मै खुद से अपना दर्द कहा

अपनी ही बाहों में बहुत रोया

मै खुद का हमदर्द बन गया

अच्छा लगा जब मै खुद के पास गया,

और अपनी जिन्दगी का हिसाब माँगा

एक-एक दर्द का,हर एक आंसू का

मेरे हिस्से ही इतना दर्द क्यों.

चिल्ला रहा था मै खुद पर

और मेरी जिन्दगी मुस्कुरा रही थी

तभी एक आवाज आई

सारा दोष तुम्हारा है

गुजरा हुआ अतीत भी तुम्हारा है

आने वाला वह सुनहला कल भी तुम्हारा होगा

क्यों की आज तुम्हारा “मै” तुम्हारे पास नहीं है

जो प्रश्न आज तुमने मुझे कहा

उसका हर जबाब तुम्हारे पास है

तू उठ और चल अब कोई तुझे प्रभावित नहीं करेगा

तू खुद अपनी मुकद्दर का बादशाह होगा…..

 
 

मृगत्रिष्णा

आज चांदनी रात में

तुम्हारी तप में लिन हू

मेरे तप की तुम साधना हो आराधना हो

ऐसे में तुम

दूर बहुत दूर खड़ी परी की भांति

दुधिया लिबास में बाहें फैलाये

मुझे बुला रही हो

दौड़े जाता हू तुम्हारे पास

पर वहाँ तुम नहीं तुम्हारी परछाई नहीं

काश की झड़ी नजर आती है

थक कर बैठ जाता एक पेड़ के निचे

तभी तुम मेरे सर पे हाथ रखकर

मुझे सांत्वना देती हो

बाहें पकड़ कर सहारा देती हो

चौंक कर उठता हू

तो सर पे लताएँ नजर आती है

बाहों में साँप लिपटा नजर आता है

चीख कर दूर जा गिरता हू “मृगत्रिष्णा” के भँवर में

ये जानते हुए की इसे कभी पा नहीं सकूँगा

पा नहीं सकूँगा……………………………………!

 

नही आयेगे वह गली

नही आयेगे वह गली
नही आयेगे तुम्हारे घर
नही देखेगे तुम्हे ता उम्र
आपने मन मन्दिर में
बिठा कर पूजा करेगे
महसूस करेगे तुमको
हर पल हर वक्त
कट जायेगी मेरी जिंदगी
कल भी तुहारा था आज भी तुम्हारा हु
कल भी तुम्हारा रहूगा
अंतिम साँस मे भी
तुमको बिठाये रखुगा
ख़ुद को भूल जायेगे तुम को भुला नही पायेगे…………….

 
 
हिन्दप्रभा

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